Tuesday, April 3, 2018

पैसों की जरूरत तो बड़े लोगों को है, गरीबों को नहीं

  • गरीबों को पैसों की जरूरत नहीं, तभी को कम मेहनताना मिलता है
  • अमीरों के खर्चे ज्यादा है, इसलिए उनको ज्यादा पैसे चाहिए
  • 11 घंटे ड्यूटी, बिना छुट्टी के मात्र 7500 रुपये मासिक वेतन
❃ मैं आज शाम देहरादून से अपने घर लौट रहा था। अंधेरा हो गया था, करीब शाम सवा सात बजे का समय रहा होगा। रास्ते में कुछ महिलाओं ने टैक्सी को रुकने का इशारा किया। ड्राइवर ने चार महिलाओं को कार में बैठा लिया। पीछे वाली सीट पर चार ही महिलाएं बैठ सकती थीं, इसलिए पांचवीं सवारी के लिए जगह नहीं बनी। वहां दस से ज्यादा महिलाएं और बेटियां घर जाने के लिए बस या अन्य सवारी वाहनों का इंतजार कर रहे थे। 

 रास्ते में ड्राइवर ने एक फैक्ट्री का नाम लेते हुए पूछा, अभी छुट्टी हुई है। सभी ने हां जी कहते हुए हामी भरी। मैंने पूछा, आप लोगों की ड्यूटी का समय क्या है। पता चला कि सुबह आठ बजे से ड्यूटी शुरू होती है  और शाम सात बजे तक काम करते हैं। मैंने कहा, क्या 15 घंटे ड्यूटी करते हो। इनमें से एक महिला ने जवाब दिया, 15 नहीं 11 घंटे। सुबह आठ से शाम सात बजे तक। मैंने आपको फैक्ट्री का नाम क्यों नहीं बताया, आपने अंदाजा लगा लिया होगा। 

❃ मैंने अपनी गलती सुधारते हुए कहा- हां ठीक कहा आपने, 11 घंटे ही होते हैं। टैक्सी ड्राइवर ने कहा, इनको प्रति घंटे के हिसाब से दिहाड़ी मिलती होगी, इसलिए ये 11 घंटे काम करते हैं। तभी महिला ने जवाब दिया, हम दिहाड़ी पर नहीं बल्कि प्रति माह की तनख्वाह पर काम करते हैं। हमको हर महीने साढ़े सात हजार रुपये मिलते हैं। दिन में पूरे 11 घंटे काम करना पड़ता है। दिन में केवल खाना खाने का समय मिलता है। 

❃ मैंने पूछा, सप्ताह में एक छुट्टी जरूर मिलती होगी। इनमें से एक महिला ने जवाब दिया, हमारी कोई छुट्टी नहीं होती। त्योहार के दिन भी फैक्ट्री आना होता है। एक दिन छुट्टी करने वालों को दूसरे दिन फैक्ट्री गेट से अंदर नहीं दिया जाता यानि नौकरी की छुट्टी। पूरे महीने काम करने वालों को ही तनख्वाह मिलती है। अगर ड्यूटी टाइम आठ बजे के एक मिनट भी लेट हुए तो ड्यूटी साढ़े आठ बजे नोट करके पैसे काटे जाते हैं। वहीं रोजाना घर से फैक्ट्री आने और घर जाने में 20 रुपये बस किराया देना होता है, जो महीनेभर का 600 रुपये बैठता है।  

एक महिला ने  बताया कि घर से आधा घंटे पैदल चलकर बस पकड़ते हैं। इसके बाद 11 घंटे ड्यूटी करते हैं। फिर आधा घंटे इंतजार के बाद बस मिलती है। बस से उतरकर फिर आधा घंटा पैदल चलकर घर पहुंचते हैं। यानि रात साढे़ आठ या नौ बजे घर पहुंचते हैं। घर के कामकाज भी निपटाने होते हैं। 11 बजे से पहले सोना नहीं होता। सुबह फिर पांच बजे उठ जाते हैं और सात बजे तक बस स्टैंड पर होते हैं। 

❃ उस महिला की बात सुनकर मैं यह सोचने को मजबूर हो गया कि इनके लिए जीवन का मतलब क्या कष्ट सहना है। मशीन की तरह काम करने वाले ये लोग जीने के लिए कब तक संघर्ष करते रहेंगे। क्या जीवनभर इनको इसी तरह काम करना पड़ेगा। अगर हम इनकी प्रति माह तनख्वाह और बस किराये का हिसाब लगाएं तो इनको प्रति घंटा मेहनत मजदूरी के 21 रुपये ही मिलते हैं। वो भी तभी, जब उनको एक घंटा पैदल चलना पड़ता है। 

❃ इनमें से एक महिला ने कहा, नेताओं को अपने से मतलब है। हम लोगों की फिक्र किसी को नहीं। वह कह रही थी कि- कोई बता रहा था कि विधायकों ने अपनी तनख्वाह बढ़ा ली। बड़े लोग हैं, शायद इनको पैसे की ज्यादा जरूरत होगी। जितने बड़े लोग, उतने ज्यादा खर्चे। इसलिए तो अपने पैसे बढ़ा लिए। इन लोगों को लगता है कि गरीबों के खर्चे कम होंगे। इसलिए गरीबों को पैसों की जरूरत नहीं पड़ती। तभी तो हम लोगों को ज्यादा मेहनत करने के बाद भी कम पैसे मिलते हैं। 

❃ घर पहुंचकर मैंने टीवी पर एक विज्ञापन देखा, जो उसी फैक्ट्री के उत्पाद का था, जिसमें ये महिलाएं और बेटियां 11-11 घंटे मशीनों की तरह काम करती हैं। वो भी बिना कोई अवकाश लिए। अवकाश लिया तो नौकरी खोने का या फिर पैसे कटने का डर बना रहता है। मैं तो इन मातृशक्ति की मेहनतकश जिंदगी को सलाम करता हूं ...





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