Sunday, July 28, 2019

डॉगी की चिट्ठी

सभी इंसान बुरे नहीं होते

जमाना कितना भी क्यों नहीं बदल जाएसभी इंसान बुरे नहीं होते। कुछ इंसान हैं जो हमारे साथ पशुता वाला नहीं बल्कि विशुद्ध रूप से मानवता वाला व्यवहार करते हैं। हम बोल नहीं पातेउनको बता नहीं पातेहमारे पास इंसानों से संवाद की ताकत नहीं है। हम अपनी तकलीफों और बातों को कुछ संकेतों के जरिये उन तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं। 

कभी वो समझ पाते हैं और कभी नहीं । भला हो उनका जो हमारी पीड़ा को समझकर राहत पहुंचाते हैं। हम शुक्रगुजार हैं उन लोगों के जो हमारे सुख और दुख को लेकर संवेदनशील हैं। दोस्तों मैं तुम्हें यह चिट्ठी उस पशु चिकित्सालय से लिख रहा हूंजहां मैं उस वक्त लाया गया थाजब मुझमें जीने की आस लगभग खत्म हो गई थी। 

उस रात मैं देहरादून के मोहकमपुर फाटक के पास खड़ा था। फाटक बंद था। अब तो वहां फ्लाईओवर बन गया है। मेरे पैरों में बहुत दर्द हो रहा था और मैं अचानक रेलवे ट्रैक से कुछ ही दूरी पर बीच  सड़क पर गिर गया। ट्रेन जाने के बाद फाटक खुला और गाड़ियों ने रफ्तार पकड़ ली। कोई  मुझे नहीं देख पाया और थोड़ी ही देर में मेरे ऊपर से एक के बाद एक करके कई गाड़ियों के टायर गुजर गए। 

मैं बुरी तरह जख्मी हो गया। मेरे मुंह से खून का फौव्वारा फूट पड़ा था। मैं सांसें गिनने लगा। बहुत दर्द हो रहा था। शरीर से जान बाहर निकलने की तैयारी कर रही थीऐसे में, मैं तेजी से कराह भी नहीं पा रहा था। रोनेचीखनेचिल्लाने के लिए भी तो ताकत चाहिएजो मेरे शरीर से कब की जा चुकी थी। मैं उस समय समझ गया था कि वक्त तुम लोगों से दूर जाने का आ गया है। 

वो तो भला हो उन कुछ इंसानों काजिन्होंने खून से लथपथ मेरे लगभग निर्जीव हो चुके शरीर को एक कपड़े पर रख दिया और फिर उस कपड़े के सहारे उठाकर मुझे  सड़क किनारे रख दिया थाताकि मैं किसी सुरक्षित स्थान पर दम तोड़ सकूं और फिर किसी टायर के नीचे आने से बच जाऊं। मैंने पूरी रात सड़क किनारे तड़पते हुए गुजारी। फिर नई सुबह के साथ यह उम्मीद जगी कि अब तो कोई मुझे सहारा देने आएगा।

दोस्तोंआप लोग मुझे तड़पता देखने के बाद भी लाचार थे। उस समय तो मौत से यही शिकवा था कि मुंह में लेने के बाद भी वो मुझे निगल क्यों नहीं रही थी। मैं तो यही प्रार्थना कर रहा था कि प्राण शरीर से बाहर निकल जाएं। लाचारी और दर्द से मुक्ति मिल जाए। मैं भूखा और प्यासा पड़ा थाऊपर से शरीर खून से सना था। पूरा दिन बीत गया पर न तो मुझे मौत आई और न ही मेरी मदद के लिए राह चलता कोई राहत लेकर पहुंचा। 

मैं एक ऐसी उम्मीद के सहारे सड़क किनारे पड़ा कराह रहा थाजिसके पूरा होने को लेकर मुझे शक था। गाड़ियों की लाइटें जलती देखने से मालूम हो गया था कि दिन डूब गया। समझ गया कि अब तो रात होने वाली है। मौत अक्सर रात को ही आती हैइसलिए अब किसी मदद की नहीं बल्कि मौत का इंतजार करने लगा।

थोड़ी ही देर में एक वैन मेरे पास आकर रुकती है और देखता हूं कि दो लोग मेरी ओर बढ़ रहे हैं। समझते देर नहीं लगी कि अब राहत मिलने वाली है। मैंने इंसानों को ही सुना था कि जब जिंदगी बची हो तो मौत खूब सताने के बाद भी कुछ नहीं बिगाड़ पाती। लगा कि अब कुछ भला हो जाएगा।

कुछ ही देर में एंबुलेंस मुझे लेकर चिकित्सालय पहुंच गई। यहां कई दिन के इलाज और वक्त पर खाना-पानी,दवा मिलने की वजह से मेरी हालत में सुधार आ रहा है। मेरा कष्ट दूर हो रहा है और शरीर से बहे खून की रिकवरी हो रही है। 

यहां मेरी तरह लाए गए डॉगियों की पूरी गैंग हैजिनको कभी बांधकर नहीं रखा जाता। ये अपनी इच्छा से कहीं भी बैठ और घूम सकते हैं। यहां डॉगी और कैट सभी एक साथ रहते हैं और दिनभर खेलते हैं। और भी कई तरह के जरूरतमंद और घायल जानवरों को यहां लाया गया है। ये पूरी देखभाल के साथ इलाज पा रहे हैं। समय पर खाना मिलता है और पूरी मौज मस्ती के साथ रहते हैं। 

अगर मैं अस्पताल नहीं लाया जाता तो शायद इस चिट्ठी में अपनी व्यथा को बयां नहीं कर रहा होता। मुझे ठीक होने में अभी कुछ और समय लगेगा। कुछ दिन पहले मैं सुन रहा था कि रेस्क्यू और पूरे इलाज के बाद हमारे जैसे स्ट्रीट एनीमल्स को उसी जगह छोड़ दिया जाता हैजहां से उनको लाया जाता है। ये चाहते हैं कि स्ट्रीट एनीमल्स फिर से खुली हवा में अपनी पसंद की जिंदगी को जी सकें। 

दोस्तों तुम से बिछुड़े हुए लगभग दो महीने हो गए हैंइसलिए तुम सभी को याद कर रहा हूं। तुम लोगों को यह बताना चाहता हूं कि अधिकतर इंसान बुरे नहीं होते। मुझे अपनी गाड़ियों के नीचे कुचलने के बाद कराहता छोड़कर भागने वाले बुरे हो सकते हैं। मुझको सड़क किनारे सुरक्षित रखने वालेमेरे कष्ट को देखकर रेस्क्यू टीम को सूचना देने वाले और आखिर में चिकित्सालय वाले सभी लोग अच्छे इंसान हैं। 

पशुओं के साथ अच्छा व्यवहार करने वाले संवेदनशील लोगों की वजह से ही हम हैं। मैं कुछ वक्त के बाद फिर से डॉगी गैंग में शामिल होकर मोहमकमपुर की गलियों और सड़कों पर दौड़ लगाऊंगा। फिर से खूब मस्ती करेंगे। 

अस्पताल से तुम्हारा दोस्त 

Monday, April 15, 2019

डोईवाला में रोटी बैंक

मैंने अपने मित्र से सुना है कि केशवपुरी में एक बालिका रहती है, जो कोई शब्द बताते ही तुरंत कविता बना सकती है। वाकई बहुत मेधावी है यह बच्ची, लेकिन मैं उससे मुलाकात नहीं कर पाया। केशवपुरी वह इलाका है, जहां अधिकतर परिवारों के सामने हर सुबह रोजगार की तलाश, एक बड़ा सवाल होता है। यहां शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता के लिए जागरूकता की दरकार हमेशा महसूस की जाती रही है।
केशवपुरी औऱ राजीवनगर में रहने वाले कुछ बच्चे डोईवाला की सड़कों पर ही पूरा दिन बिताते हैं। यहां के कई बच्चों को स्कूल का रास्ता दिखाने की जरूरत है। हालांकि यहां सरकारी स्कूल है, लेकिन इन बच्चों को वहां तक ले जाने की चुनौती भी हम सभी को स्वीकार करनी होगी। और भी बहुत कुछ सुना है मैंने केशवपुरी के बारे में..., जिसका जिक्र मैं इसलिए भी नहीं करूंगा, क्योंकि समस्या बताने, सुनाने से ज्यादा विश्वास समाधान पर करना चाहिए।
अभी तक केशवपुरी की यह तस्वीर सबके सामने पेश की जाती रही है। अब आपके सामने केशवपुरी की दूसरी तस्वीर पेश करता हूं, जो वाकई कमाल की है। अब मैं यहां से प्रज्ज्वलित हुई एक ऐसी मशाल का जिक्र कर रहा हूं, जिसकी रोशनी में भूख के खिलाफ एक जंग चल रही है। यह वो बड़ी जंग है, जिसकी शुरुआत एक युवा ने की है, जो दिन हो या रात, सुबह हो या शाम, केवल उनके लिए जीने की कोशिश करता है, जिनसे उसका एक ही रिश्ता है, वो है मानवता का।
कविता वाली बिटिया के घर का पता पूछने के दौरान मेरे मित्र और शिक्षक अजेश धीमान ने मुझे बताया कि केशवपुरी में रोटी कपड़ा बैंक भी है, जिसे मनीष उपाध्याय चलाते हैं। मनीष जी का फोन नंबर मिल गया और रविवार शाम करीब सात बजे तक धिनाधिन की टीम मैं और बेटा सार्थक केशवपुरी में मनीष जी के घर पहुंच गए। केशवपुरी स्थित सरकारी स्कूल के पास है रोटी कपड़ा बैंक, जहां से शुरू हो रही है मानवता के लिए एक बड़ी मुहिम, वो भी बिना किसी शोर के।
रविवार को एक भंडारे से बहुत सारी पकौड़ियां रोटी बैंक में जमा कराई गई थीं। अन्य दिनों में मनीष शाम पांच बजे से पहले ही घर पहुंच जाते हैं। आज मनीष को भी घर लौटने में थोड़ा देर हो गई थी। इसलिए तय किया गया कि पकौड़ियां और खिचड़ी बांटी जाए। मनीष और उनकी पत्नी संतोष करीब 25 से 30 लोगों के लिए खिचड़ी बनाने में जुट गए। संतोष केशवपुरी में ही आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं और रोटी कपड़ा बैंक में मनीष को सहयोग करती हैं। मां अमरेश देवी कहती हैं कि रोटी बैंक पर उनको काफी गर्व है।
करीब आठ माह से रोटी कपड़ा बैंक चल रहा है। मनीष बताते हैं कि वह हाट पर सब्जियां बिक्री करते थे, लेकिन वहां काफी समय लग जाता था, इस वजह से खाना बांटने में देरी होती थी। अगर किसी को समय पर खाना नहीं मिलेगा तो भूखा ही सो जाएगा। कोई भूखा सो जाए, यह स्थिति बड़ी पीड़ा देने वाली है। इसलिए उन्होंने हाट पर जाना छोड़ दिया।
अब वह मंडी से आलू, प्याज लाकर सीधे दुकानों को सप्लाई करते हैं। शाम पांच बजे तक घर लौटकर सब्जी, रोटी बनाने में जुट जाते हैं। अभी तक एक या दो दिन ही ऐसा हुआ होगा, जब हम भोजन देने नहीं जा सके। बहुत बुरा लगा था उस दिन। कोई हमारा इंतजार करे और हम नहीं पहुंचे, यह तो सही बात नहीं है। इसलिए हम हर शाम खाना लेकर जाएंगे, यह हमारा इरादा है।
हमारे पूछने पर मनीष बताते हैं कि रोजाना करीब साढ़े चार किलो आटा गूंथते हैं। रोटियां बनाने के लिए पड़ोस से कुछ बेटियां आ जाती हैं। कभी कभार वह स्वयं रोटियां बनाते हैं। उनके पिता सत्यप्रकाश जी कैटरिंग का व्यवसाय करते हैं, इसलिए वह भी खाना बनाना अच्छे से जानते हैं।
करीब 30 साल के मनीष की सोच बड़ी है और वह रोटी कपड़ा बैंक तक ही सीमित नहीं रहना चाहते, उनकी योजना भविष्य में वृद्धाश्रम बनाने की है। ऐसा वह उन बुजुर्गों की स्थिति को देखकर सोचते हैं, जो या तो अपने बच्चों के तिरस्कार को सहन कर रहे हैं या उनका कोई सहारा नहीं है। मनीष ने बताया कि शुरुआत में 90 साल के व्यक्ति को भोजन का पैकेट दिया था, उनका कहना था पहले खुद खाओ।
मनीष ने तुरंत पैकेट खोला और उनके सामने रोटी सब्जी खाई। इस पर उस व्यक्ति ने धन्यवाद कहकर उनसे खाना ले लिया। उस दिन से मनीष बांटने के लिए ले जाने से पहले भोजन को स्वयं चखते हैं, यह इसलिए भी, क्योंकि वह जानना चाहते हैं कि खाना कैसा बना है। इसमें कोई कमी तो नहीं है।
दूसरे के विश्वास को बनाकर रखने के साथ ही मनीष उन लोगों की निजता का भी सम्मान करते हैं, जिनको रोजाना शाम भोजन दिया जाता है। वह बताते हैं कि दो परिवार डोईवाला से दूर किसी गांव में रहते हैं, वहां शाम को भोजन पकाकर भेजना मुश्किल है, इसलिए उनको पूरे माह का राशन भेजा जाता है। भोजन वो स्वयं पका लेते हैं। इस पूरे कार्य को वह अपने स्तर से, दोस्तों के सहयोग से, कुछ समाजसेवियों की मदद से पूरा कर रहे हैं। शादी, समारोह में बचने वाले भोजन के लिए उनके पास सूचना आ जाती है, वह अपने टैंपों से यह खाना लेकर आते हैं और पैकेट बनाकर बांट देते हैं।
बताते हैं कि मानसिक रोग की वजह से सड़कों पर घूमने वाले, रेलवे स्टेशन पर बेसहारा पड़े, गरीबी और उम्र की वजह से भोजन का इंतजाम नहीं कर पाने वाले लोगों के लिए रोटी कपड़ा बैंक काम कर रहा है। हम केवल शाम को भोजन परोस रहे हैं। दुकानदार निखिल गुप्ता, छात्र लकी कुमार, सिटी बस ड्राइवर मोनू, नीतू सहित करीब 50 युवा इस कार्य में समय-समय पर सहयोग करते रहे हैं। हमारे पास बांटने के लिए कपड़े भी आते हैं। वह बागवानी का शौक भी रखते हैं और पौधे तैयार करके आसपास के लोगों को बांटते रहे हैं।
उन्होंने बताया कि मैं यह सब इसलिए कर रहा हूं,क्योंकि मुझे अच्छा लगता है। हर व्यक्ति दुनिया में किसी खास मकसद के लिए आता है। ईश्वर ने मुझे यह कार्य सौंपा है, तो मैं ऐसा कर रहा हूं। मैं किसी पर कोई अहसान नहीं कर रहा, बल्कि अपने इंसान होने का फर्ज निभा रहा हूं। मुझे लगता है कि हर व्यक्ति को कुछ न कुछ ऐसा करना चाहिए, जो इंसानियत को आगे बढ़ाए। सभी अच्छा महसूस करें, खुश रहें, मैं तो बस इतना चाहता हूं।
मनीष जी से फिर मिलने का वादा करके मानवभारती प्रस्तुति तक धिनाधिन की टीम वापस लौट आई। हम फिर केशवपुरी जाएंगे उस बिटिया से मिलने के लिए जो कोई भी शब्द बताते ही तुरंत कविता की रचना कर देती है, तब तक के लिए बहुत सारी खुशियों और शुभकामनाओं का तक धिनाधिन।

Friday, March 8, 2019

लुभाते फूल, मुस्कराते फूल और कुछ सिखाते फूल

सुबह घर से स्कूल आते समय मुझे बहुत अच्छा लगता है, क्योंकि यह वह समय होता है जब आप फुर्ती और ताजगी से भरे होते हैं। स्कूल में प्रवेश करते ही मुझे दिखाई देती है फूलोें की बगिया। रंग बिरंगे मुस्कराते फूल, कोई बड़ा और कोई छोटा। कोई आसमां छूने के लिए बेताब तो कोई हरियाली के बीच से बाहर की ओर झांकता हुआ, नजर आता। कोई कहता मैं सबसे सुंदर, कोई कहता मेरी ओर देखो, कितने सारे रंग हैं मेरे पास। देख रहो हो न मुझे, मैं कितना प्यारा लग रहा हूं। कुदरत ने मुझे बड़ा मन लगाकर बनाया है, धरती की शोभा बढ़ाने के लिए। कलियां तो मानो यह कह रही हैं कि देखना एक दिन हमारा भी आएगा और तुम हमें देखकर कहोगे, वाह कितने खूबसूरत लग रहे हैं ये फूल। 

फूलों को देखते ही तन और मन ताजगी से भर आते हैं। मैंने सुना है, जब तन और मन में उत्साह हो तो सबकुछ अच्छा लगता है, पढ़ाई के साथ हर वो एक्टीविटी जो हमें स्कूल में कराई और सिखाई जाती है। हां, खेलकूद भी। मुझे अब महसूस होता है कि फूल केवल किसी परिसर और भवन का आकर्षण ही नहीं बढ़ाते, बल्कि अपने पास रहने वाले लोगों को कुछ नया करने का आइडिया भी देते हैं। 


मैंने माली जी से कहा, आप इन फूलों के साथ बहुत मेहनत करते हो। मैं आपको अक्सर फूलों के पास देखता हूं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि आप इनसे बातें करते हो। समय पर खाद, मिट्टी तैयार करना, बीज, पौधे लगाने से लेकर समय-समय पर पानी देना। खराब पत्तियों को हटा देना, पौधे के पास साफ सफाई रखना, धूप और छांव का ध्यान रखना, कीटों से बचाकर रखना, यह सब काम आप फूलों को खिलाने के लिए करते हो। आप इनका ठीक उसी तरह ख्याल रखते हो, जैसे कोई बच्चों का। क्या आपका महत्व फूलों को खिलाने और उनको आकर्षक बनाने तक ही है या इनमें आप इससे भी ज्यादा कुछ और देखते हैं। 

माली जी से बात करके मुझे अपने इस सवाल का जवाब मिल गया कि किसी भी स्कूल में फूलों की बगिया होना, क्यों जरूरी हैं। फूलों से हम क्या सीखते हैं। माली जी ने कहा, मैं फूलों के साथ माता-पिता और शिक्षक दोनों तरह की भूमिका निभाता हूं। माता पिता अपने बच्चों की परवरिश में कोई कमी नहीं छोड़ते। बच्चों की हर सुविधा का ध्यान रखते हैं। वहीं स्कूल में शिक्षक बच्चों की शिक्षा से लेकर उनकी रचनात्मकता को बढ़ाने, अच्छे बुरे का ज्ञान कराने, अनुशासन में रहने, कुछ नया करने के लिए प्रेरित करने, उनकी कमियों को दूर करने, उनको सफलता की ओर बढ़ाने का प्रयास करते हैं। ठीक इसी तरह पौध रोपने से लेकर अलग-अलग रंगों, फूलों को पूरे आकार में खिलाने और आकर्षक दिखाने का काम माली करता है। फूलों ही नहीं, वो उनके पौधों और पत्तियों को संवारने का काम भी करते हैं। मुरझाने वाले फूल पौधों को खिलाने, संवारने के लिए उनका प्रयास ठीक किसी शिक्षक की तरह होता है, जो अपने छात्र को सही दिशा में लाने के लिए हरसंभव प्रयास करते हैं। 

मेरे स्कूल परिसर में फूलों का बसंत है, जो अपने छात्र-छात्राओं को यह सिखाने और बताने का प्रयास है कि आपका मन और तन फूलों की तरह सुंदर और ताजगी से भरपूर हो, तभी तो कुछ अभिनव कर सकोगे, तभी तो आप सफलता की ओर बढ़ सकोगे, तभी तो आप में आसमां को छूने की बेताबी होगी, तभी तो आपका जीवन खुशियों से महक उठेगा। वो भी बिना तनाव के, क्योंकि फूल तनाव से दूर रखते हैं। अब मेरी समझ में आया कि मेरे स्कूल ने फूलों की बगिया क्यों बनाई है। 

Saturday, September 29, 2018

तुमने मुझे बनाया, मैं तुम्हारा बना रहा हूं

वो मुझसे पूछ रहा था कि क्या नदी में कूड़ा नहीं फेंकना चाहिए। मैंने कहा, नदी में कूड़ा फेंकना अपराध है। नदी को दूषित करना सही नहीं है। उसने जवाब दिया, तो कोई बात नहीं, मैं नदी के पास कूड़ा फेंक देता हूं। यह तो अपराध नहीं है। मैंने कहा, तुम ऐसा भी नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करने से गंदगी तो नदी में ही जाएगी। बरसात में कूड़ा नदी को प्रदूषित कर देगा। उसके पास एक और जवाब था कि बरसात में तो पानी को नदी में जाने से नहीं रोक सकते। वैसे भी जिस नदी की तुम बात कर रहे हो, उसमें कूड़ा बह भी जाए तो पता नहीं चलेगा, क्योंकि वह तो पहले से ही नाला बन गई है।



मैंने कहा, तुम्हें उसको फिर से नदी बनाने के प्रयास करने होंगे। कूड़ा फेंककर उसे और दूषित मत बनाओ। वह बोला, अब ज्यादा बात नहीं सुननी। यह तो मुझे तय करना है कि कूड़ा कहां फेंका जाए। वह बोलता जा रहा था और मैं सुनता। उसने कहा, यार तुमसे नदी में कूड़ा फेंकने के बारे में क्या पूछ लिया, तुम तो सिर पर चढ़ गए। मैंने कहा, तुमने मुझसे क्यों पूछा। वह बोला, तुम आम आदमी हो, इसलिए पूछ लिया।

अगर नहीं पूछता तो कहते कि मैंने तुम्हारी राय नहीं ली। मैंने कहा कि मैंने मना कर दिया न, नदी के पास कूड़ा मत फेंको। तो फिर तुम कूड़ा वहां से क्यों नहीं हटा रहे। वह बोला, मैं तुम्हारी राय नहीं मानता। मैंने कहा, मत मानो मेरा कहना। जैसी तुम्हारी इच्छा, क्या स्वच्छ हवा में सांस लेने दोगे हमें। वह बोला, देखेंगे, फिलहाल तो ऐसे ही जिओ, जैसे अभी तक जी रहे थे।

मैंने उससे ही पूछ लिया कि तुम अपने बारे में ही बता दो कि तुम कौन हो, वह बोला- मुझे नहीं पहचानते। मैंने कहा, नहीं मैं तुम्हें नहीं पहचानता। वह बोला, मैं तो तुम्हारी ही बदौलत हूं। तुम नहीं होते तो मैं भी क्यों होता। मुझे तो तुमने ही बनाया है। मैंने कहा, जब मैंने तुमको बनाया है तो तुम मेरा कहना क्यों नहीं मानते। वह बोला, यह नहीं हो सकता। मैं तो वही करूंगा, जो मैं चाहूंगा। तुम्हारी भूमिका केवल मुझे बनाने की है। तुमने मुझे बनाया और अब मैं तुम्हारा बना रहा हूं। क्या समझे...।





डॉगी की चिट्ठी

सभी इंसान बुरे नहीं होते जमाना कितना भी क्यों नहीं बदल जाए ,  सभी इंसान बुरे नहीं होते। कुछ इंसान हैं जो हमारे साथ पशुता वाला नहीं बल्...