Sunday, January 19, 2020

केशवपुरी की गीता बेटियों को बना रही आत्मनिर्भर

पढ़ाई अच्छी बात है और यह आपके भविष्य को अच्छा बनाने में मदद करती है। दो साल पहले मैंने कक्षा आठ के बाद पढ़ना छोड़ दिया, पर मुझे अच्छे भविष्य के लिए कुछ तो करना था। मैंने सिलाई करना सीख लिया। कपड़े सिलाई में मेरा मन लगने लगा और आज इस हुनर ने मुझे आत्मनिर्भर बना दिया।
मैं अपने सिलाई सेंटर पर और लड़कियों को भी कपड़े सिलना सीखा रही हूं। एक साल भी नहीं हुआ, अब तक आठ लड़कियां मुझसे सीख चुकी हैं। वो किन्हीं और सिखाएंगी और फिर उनसे सीखने वाले किन्हीं और को। मुझे भी सिलाई से रोजगार मिल गया है। एक माह में लगभग पांच हजार रुपये तक की आय हो जाती है।
तक धिनाधिन की टीम रविवार को केशवपुरी बस्ती में गीता के घर पर थी। गीता से बात करते हुए हमें महसूस हुआ कि केशवपुरी बदल रहा है। रोटी कपड़ा बैंक के मनीष कुमार उपाध्याय की तरह गीता ने भी अभिनव पहल की है। होनहार बेटी गीता यहां ऐसी मशाल प्रज्ज्वलित कर रही है, जिसकी रोशनी में बेटियां आत्मनिर्भर हो रही हैं। सच मानिये गीता के साथ इन सभी बेटियों का आने वाला कल, सुखद और खुशहाल होगा।




गीता ने हमें बताया कि उनके दो भाई और चार बहनें हैं। पिता रवि साहनी की करीब छह साल पहले मृत्यु हो गई थी। मां पर परिवार चलाने की जिम्मेदारी आ गई। मां सुशीला दिहाड़ी मजदूरी करके परिवार का पालन कर रही हैं। मेरा मन पढ़ाई में नहीं लगा, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। मां ने मुझे स्कूल भेजने का काफी प्रयास किया। मैं चाहती थी कि सिलाई सीखकर मां को सहयोग करूं। डोईवाला में एक सिलाई सेंटर पर लेडिज कपड़े बनाना सीखा। सिलाई में डिप्लोमा भी हासिल किया।
जब मुझे विश्वास हो गया कि मैं अब अच्छी तरह कपड़े सिलाई कर सकती हूं तो घर के पास ही एक सेंटर खोल लिया। मेरे पास कुछ लड़कियां भी सिलाई सीखने आने लगीं। मुझे अच्छा लगता है कि जब मैं लड़कियों को सिलाई सिखाती हूं। जब तक मेरे पास लड़कियां सिलाई सीखने आती रहेंगी, मैं उनको सिखाती रहूंगी। गीता ने संदेश दिया कि बेटियों को स्कूल भेजिए, उनको अच्छे भविष्य से कुछ हुनर जरूर सिखाइए। घर में साफ सफाई रखिए और स्वस्थ रहें।
इस दौरान हमारे साथ रोटी कपड़ा बैंक के संचालक मनीष कुमार उपाध्याय थे। मनीष जी भी केशवपुरी में रहते हैं और डोईवाला क्षेत्र में असहाय, बेसहारा लोगों को शाम का भोजन उपलब्ध कराते हैं। मनीष कहते हैं कि उनके इस काम में एक दिन की छुट्टी नहीं हो सकती,क्योंकि ये लोग उनका इंतजार करते हैं। वो नहीं चाहते कि कोई भूखा सोए। वहीं कक्षा नौ के छात्र सार्थक पांडेय ने फोटो और वीडियो कवरेज में सहयोग किया।
गीता के साथ बातचीत के समय वहां बच्चे भी पहुंच गए। हमने उनसे बात की, उनसे पढ़ाई लिखाई के बारे में पूछा। कक्षा आठ की छात्रा रिंकी ने विख्यात कवि शिव मंगल सिंह सुमन जी की कविता सुनाई।
हम पंछी उन्मुक्त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाएंगे
कनक-तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाएंगे ।
हम बहता जल पीनेवाले
मर जाऍंगे भूखे-प्यासे
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक-कटोरी की मैदा से ।
स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में
अपनी गति, उड़ान सब भूले
बस सपनों में देख रहे हैं
तरू की फुनगी पर के झूले ।
ऐसे थे अरमान कि उड़ते
नील गगन की सीमा पाने
लाल किरण-सी चोंच खोल
चुगते तारक-अनार के दाने ।
होती सीमाहीन क्षितिज से
इन पंखों की होड़ा-होड़ी
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
या तनती सॉंसों की डोरी ।
नीड़ न दो, चाहे टहनी का
आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो
लेकिन पंख दिए हैं तो
आकुल उड़ान में विघ्न न डालो ।
पिंकी को पूरी कविता याद है और इसका अर्थ भी मालूम है। बताती हैं कि उनकी किताब में है यह कविता। उन्होंने शुरू की चार लाइनों को अर्थ समझाया कि पक्षियों को पिंजरों में बंद न रखो। इनको गगन में स्वतंत्र होकर उड़ने दो। उनको आपकी कटोरी में रखा पानी नहीं चाहिए, ये तो नदियों का बहता जल पीने की चाह रखते हैं। आप उनकी उड़ान में बाधा मत डालो।
पिंकी ने हमारे इस सवाल का बहुत शानदार जवाब दिया कि हवा को एक दिन की छुट्टी दे दी जाए तो क्या होगा। पिंकी बताती हैं कि हवा को छुट्टी देने का मतलब है कि पूरे वातावरण में से आक्सीजन को खत्म कर देना। आक्सीजन नहीं रहेगी तो हम सबका जीवन भी नहीं रहेगा।
वातावरण में धुआं करके, ज्यादा ईंधन फूंक कर हवा को नाराज करना अच्छी बात नहीं है। वायु में प्रदूषण फैलाएंगे तो एक दिन हवा हमसे दूर चली जाएगी। हमने पेड़ घूमने क्यों नहीं जाता, सवाल भी पूछा, जिसका बच्चों ने बहुत शानदार जवाब दिया और फिर पेड़ की महत्ता पर हमसे बात की। बच्चों से बहुत सारी बातों के बाद हम फिर लौट आए, आपको सबकुछ बताने के लिए।
फिर मिलते हैं तक धिनाधिन के अगले पड़ाव पर, तब तक के लिए आपको बहुत सारी खुशियों और शुभकामनाओं का तक धिनाधिन। कृपया तक धिनाधिन के फेस बुक पेज को फॉलो करें, ताकि हम और आप कुछ बातों को साझा करते रहें। आपका स्नेह ही तो हमारा उत्साह बढ़ाता है,.कुछ नया और रचनात्मक करने के लिए।


Saturday, January 11, 2020

भर दो कॉपियां, चलाते रहो पेंसिल...



मैं बहुत छोटा था, जब मां, मेरा हाथ पकड़कर लिखना सिखाती थीं। कभी मेरा हाथ पकड़कर तो कभी अक्षर पर बार-बार पेंसिल फेराकर लिखने का अभ्यास कराया जाता था। उस समय, मैं अपनी कॉपी पर जहां मन किया पेंसिल फेरा देता था। तिरछी लाइनों और कभी समझ में नहीं आने वाली आकृतियों से पेज खराब करता था। छोटा था, इसलिए मेरी यह गलतियां हंसकर माफ कर दी जाती थीं।
मैंने बड़े भाई की कई किताबों और कॉपियों को फाड़ा। उनकी किताबों पर पेन, पेंसिल फेराकर अपने ज्ञान का परिचय दिया था। दीवारों को भी कॉपी समझकर खराब करने का तमगा मुझे मिला है। मां तो थोड़ा बहुत डांटती थीं, पर पापा ने हमेशा मेरा बचाव किया और दीवारों पर मेरी कलाकारी का हंसकर स्वागत किया।
पापा तो अब नहीं रहे, पर जब मां मुझे यह बताती हैं तो सिवाय हल्की सी मुस्कराहट के मेरे पास, अपने बचाव में कोई जवाब नहीं होता है, इसलिए अब मैं किसी बच्चे को यह कहूं कि तुमने कॉपी का क्या हाल कर रखा है, तो ठीक नहीं होगा। यह बात तो बच्चों को वही समझा सकता है, जिसने कभी अपनी या किसी और कॉपी किताबों को नहीं फाड़ा हो।
लगभग 40 साल पहले का यह दृश्य धुंधला सा ही पर, मैं देख पा रहा था या यह कह सकते हैं कि याद कर रहा था। इसलिए उन दिनों को याद करने का मौका मिला तो मैंने भी बच्चों से कह दिया, कॉपियां और आ जाएंगी, पहले तुम सब अपने मन की आकृतियों से इनको भर दो। यह क्रम तब तक चलता रहे, जब तक कि तुम उन अक्षरों को बनाना न सीख लो, जो शब्दों का संसार बनाते हैं।
मैं हिन्दी वर्णमाला का 'इ' नहीं लिख पाता था, जिसे मेरी मां और टीचर ने लिखना सिखाया। यह जिक्र इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि मुझे शनिवार सुबह आठ से सवा नौ बजे तक केशवपुरी में रहने वाली बच्चों की पाठशाला डुगडुगी में हिन्दी पढ़ाने का अवसर मिला था।
डुग डुगी की यह क्लास बहुत अनोखी है, क्योंकि यहां वो बच्चे फिर से पढ़ने के लिए बैठ रहे हैं, जो कभी स्कूल छोड़ चुके थे। ये प्रतिदिन यहां आ रहे हैं और चाहते हैं कि उनकी क्लास सवा घंटे नहीं बल्कि चार या पांच घंटे की हो। पढ़ाई से उनका रिश्ता फिर से जुड़ा है, वो भी जिंदगीभर के लिए, क्योंकि वो पढ़ना चाहते हैं और हर पल आगे बढ़ना चाहते हैं।
करीब नौ साल का एक बच्चा 'अ' लिखने की बहुत कोशिश कर रहा था, पर नहीं लिख पा रहा था। मैंने उसका हाथ पकड़कर लिखना सिखाने की कोशिश की। कैरन मैम पहले से ही बच्चों को कर्व बनाने, स्टैंडिंग लाइन, स्लीपिंग लाइन और स्लान्टिंग लाइन का अभ्यास करा रही हैं, इसलिए हिन्दी के अक्षर बनाने में इस अभ्यास का काफी लाभ मिल रहा है। इस बच्चे को ज्यादा मेहनत की जरूरत नहीं पड़ी और दो-तीन बार के अभ्यास में वह 'अ' लिखना सीख गया।
कुछ बच्चे मेरी तरह 'इ' नहीं लिख पा रहे थे। कुछ बच्चों ने अक्षर तो बनाए पर वो दो लाइनों के बीच रहने वाले नियम को तोड़ रहे थे। यह देखकर मुझे अपना समय याद आ गया, जिसका जिक्र मैंने अभी अभी किया था। मैं मन ही मन मुस्करा रहा था कि ये पल तो हर किसी के जीवन में आते हैं। डुग डुगी क्लास में शनिवार को 18 बच्चे पहुंचे, सभी बच्चे अच्छा कर रहे हैं। मोहित उनियाल जी व मनीष उपाध्याय जी ने भी बच्चों को अक्षरों को सही शेप दिलाने में मदद की।
डुगडुगी स्कूल को उम्मीद है कि उसके छात्र अपने जीवन में तरक्की करेंगे, वो अपने सपनों को जरूर पूरा करेंगे, क्योंकि वो लगातार स्कूल पहुंच रहे हैं, कड़ाके की सर्दी, बारिश में भी उनके कदम स्कूल की ओर बढ़ते हैं। हम डुगडुगी स्कूल में पढ़ने वाले सभी बच्चों, खासकर बेटियों को तहेदिल से सलाम करते हैं, क्योंकि कुछ रचनात्मक सीखने, अभिनव करने, सकारात्मक बने रहने की उनकी इच्छाशक्ति ने ही तो हम सभी को बच्चों के लिए अपना कर्तव्य पूरा करने का संकल्प दिलाया है। डुग डुगी की यह ध्वनि सभी के लिए बेहतर शिक्षा, बेहतर समाज का आह्वान करती रहेगी, हमारे साथ भी और हमारे बाद भी...., जय हिन्द।

Sunday, November 3, 2019

तकधिनाधिनः बच्चों ने कही अपने मन की बात

मैं शिवानी हूं और अपने देश के लिए कुछ करना चाहती हूं। मैं उनमें से नहीं हूं, जो जीवन में कोई भी मुकाम तो अपने देश के योगदान से हासिल करते हैं, लेकिन जब देश के लिए कुछ करने का समय आता है तो वो जॉब करने यूनाइटेड स्टेट चले जाते हैं। आप जो कुछ होते हैं, अपने देश की वजह से होते हैं। मेरा मानना है कि जब हमें हमारा देश सफल बनाता है तो उसके लिए कुछ करना भी तो हमारी जिम्मेदारी है। हमें अपने भारत के लिए कुछ करना चाहिए।
तक धिनाधिन ने यह रविवार सहस्रधारा रेजीडेंसी के बच्चों को सुनने और कुछ अपनी सुनाने के लिए तय किया था। हमने बच्चों से कहा कि जो भी कुछ विचार, सुझाव या कल्पनाएं उनके पास हैं, हमें एक पेपर में लिख कर दें। चाहें तो वो अपने बारे में लिख सकते हैं, अपने दोस्तों, स्कूल, टीचर, शहर, अपनी पसंद की किसी वस्तु, किताब... जो मन करे, वो लिखें।
नर्सरी, केजी, क्लास वन के कुछ बच्चे बोले, वो तो ड्राइंग बनाएंगे, हमने कहा देर किस बात की है ड्राइंग ही बनाओ। कुछ बच्चों ने पूछा, क्या घर जाकर कलर ले आएं। हमने कहा, कलर अगली बार, इस बार तो आप पेन से चित्र ही बना दो। वैसे हमें बच्चों के लिए कलर और पेंसिल भी ले जानी चाहिए थीं, अगले कार्यक्रम में यह कमी नहीं रहेगी। हमने महसूस किया कि छोटे बच्चे पेपर पर कलर करना ज्यादा पसंद करते हैं।
हां, तो हम बात कर रहे थे शिवानी की। शिवानी क्लास 10 की स्टूडेंट हैं और उन्होंने अपने बारे में अंग्रेजी में कुछ लिखा है, जिसका अनुवाद और भाव कुछ इस तरह है- हेलो, मैं शिवानी क्लास 10 की स्टूडेंट हूं। मुझे बैडमिंटन और नृत्य पसंद हैं। मुझे स्टडी करना अच्छा लगता है। मुझे पीसीबी (फिजिक्स, कैमिस्ट्री, बायोलॉजी) की पढ़ाई करनी है, क्योंकि मैं एक सफल कार्डियोलॉजिस्ट बनना चाहती हूं।
कार्डियोलॉजिस्ट बनकर मैं उन लोगों के लिए हॉस्पिटल खोलना चाहती हूं, जो गरीबी की वजह से अस्पताल की फीस नहीं दे पाते। मैं गरीब परिवारों के मरीजों के लिए कुछ करना चाहती हूं। शिवानी की सोच और संवेदनशीलता को तकधिनाधिन सैल्यूट करता है। हम चाहते हैं कि शिवानी कार्डियोलॉजिस्ट बनकर देश की सेवा करें।
त्रिशा भी क्लास 10 की स्टूडेंट हैं। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर अंग्रेजी में लिखा है। उनका कहना है कि भारत में शिक्षा को बहुत महत्व दिया जाता है। यहां शिक्षा पाने का मतलब नौकरी पाने से है। यहां तक कि बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि तुम्हें पढ़ाई में कड़ी मेहनत करनी है और सफल व्यक्ति बनना है।
त्रिशा कहती हैं कि गरीब परिवारों के संसाधनहीन बच्चे पढ़ाई का अवसर हासिल नहीं कर पाते हैं। उनमें से अधिकतर बाल श्रमिक बनने को मजबूर हो जाते हैं। मैं स्टडी पूरी करके एक सफल एजुकेटेड पर्सन बनकर निश्चित तौर पर गरीब परिवारों के बच्चों के लिए स्कूल और कॉलेज खोलना चाहती हूं। अपनी बात के अंत में वो लिखती हैं कि हम सुरक्षित और शिक्षित भविष्य की कामना करते हैं। तक धिनाधिन त्रिशा को भी सलाम करते हुए कामना करता है कि वो सफलता हासिल करें।
जाहिर है कि बच्चे भी उन मुद्दों को लेकर संवेदनशील है, जिनकी चर्चा अक्सर बड़े बुजुर्ग करते रहे हैं। त्रिवेणीघाट पर तकधिनाधिन के समय भी यह बात सामने आई थी कि युवा आने वाले कल को बेहतर बनाने की पहल कर चुके हैं, वो भी अपने दम पर। उनके इरादों से इस बात की पूरी संभावना है कि आने वाला कल बेहतर होगा। तक धिनाधिन अपने हर पड़ाव पर बच्चों, किशोरों और युवाओं से उनके नजरिये पर बात करता है।
हम ऋषिकेश में राजेश चंद्रा, गीत सुनेजा, देहरादून में गजेंद्र रमोला, अरुण यादव, मनीष कुमार उपाध्याय, बेटियों मीना पासवान, गुंजा, त्रिशा कुलहान, शिवानी मुदगल, पौड़ी जिले में निकिता सिल्सवाल से मिले, जिनकी सोच और प्रयास इस बात के प्रमाण हैं कि हमारा, आपका और आने वाली पीढ़ियों का कल, पहले से कहीं ज्यादा बेहतर होगा।
सहस्रधारा रेजीडेंसी में वरिष्ठ पत्रकार अतुल बरतरिया और अंजू बरतरिया जी के सहयोग से आयोजित तकधिनाधिन में क्लास 1 से 10 तक बच्चे बड़े उत्साह से शामिल हुए। सहस्रधारा रेजीडेंसी के बच्चे बहुत हाजिर जवाब और अनुशासित भाव से कार्यक्रम में शामिल हुए। हमारा सवाल समाप्त नहीं हो पाता कि बच्चे जवाब देने के लिए हाथ उठा देते। बच्चों से पूछा, क्या हमारे साथ आया पेड़ अपार्टमेंट में आपके बीच आ सकता है। इस सवाल पर लगभग सभी बच्चे बोल उठे, पेड़ आपके साथ आया है। ऐसा नहीं हो सकता। पेड़ कहां चलता है।
मैंने फिर पूछा, क्या वो यहां हॉल में आ सकता है। बच्चों ने समझ लिया कि कोई पेड़ नहीं आया इनके साथ, ये तो वैसे ही बोल रहे हैं। उन्होंने भी कह दिया, पेड़ आया है तो बुला लो। देख लेते हैं कौन सा पेड़ है, जो इधर उधर घूमता है। बच्चों ने जैसे ही परमिशन दी, हम समझ गए कि ये बच्चे तो बहुत होशियार हैं। हमने कहा, क्या बात करते हो, जब आप रेल या कार से सफर करते हो तो पेड़ पीछे की ओर दौड़ते हुए नहीं दिखते। कुछ छोटे बच्चे बोले, हां हमने देखा था, पेड़ दौड़ रहे थे।
गर्व ने कहा, पेड़ क्या चांद और तारें भी घूमते हैं। मैं तो हमेशा देखता हूं आसमान में चांद कभी इधर दिखता है और कभी उधर। हमारे मूवमेंट की वजह से पेड़ हमें घूमते हुए दिखाई देते हैं। वैसे वो जाते कहीं नहीं, अपनी जगह पर ही होते हैं। इस बीच बच्चे यह भूल गए कि अपार्टमेंट के बाहर खड़े पेड़ को हॉल में बुलाना है।
एक बच्चे ने जवाब दिया कि पेड़ के पैर नहीं होते। दूसरे ने कहा, वो कहां जाएगा, उसको कहीं नहीं जाना। पेड़ इधर उधर घूमेगा तो उसको पानी भी नहीं मिल पाएगा। हमने कहा, पानी तो धरती से मिल जाएगा। जब उसको पानी चाहिए, वो नदी के पास चला जाएगा। एक जवाब मिला कि अगर पेड़ घूमने जाएगा तो इंसान नहीं घूम पाएगा। हमने सवाल बदल दिया, पेड़ हमें क्या देता है। यह पूछते ही जवाब की बौछार हो गई। फल देता है, पानी देता है, छाया देता है, खाना देता है, पेपर देता है, हवा देता है, आक्सीजन देता है। अगर पेड़ घूमने चला गया तो एक बच्चा बोला, हमें कुछ भी नहीं मिलेगा। आक्सीजन भी नहीं। न तो वो कार्बनडाइ आक्साइड ले पाएगा और न ही आक्सीजन दे पाएगा।
बच्चों को पेड़ घूमने क्यों नहीं जाता, कहानी सुनाई, जिसे काफी पसंद किया गया। आखिरकार बच्चों को पेड़ का महत्व समझाने में सफलता मिल ही गई, क्योंकि वो एक साथ बोले, पेड़ों को नहीं काटना चाहिए।
केजी की स्टूडेंट त्रिशिका ने जादूगर और पंछी की कहानी सुनाई। क्लास टू की अनुष्का ने एक लड़की की कहानी सुनाई, जो उन्होंने किसी किताब में पढ़ी थी। क्लास फोर के स्टूडेंट सुबल ने इंगलिश में लॉयन की कहानी लिखी, जो उनको टीचर ने सुनाई थी। क्लास 6 के गर्व ने बच्चों को अपनी साइकिल के बारे में बताया। उनको अपनी साइकिल बहुत पसंद है। साइकलिंग उनकी हॉबी है। जब पापा उनके लिए साइकिल लेकर आए तो वह बहुत खुश हुए थे। बताते हैं कि गियर वाली साइकिल काफी रिलेक्स वाली है। पापा ने भी उनकी साइकिल चलाई।
क्लास फाइव की स्टूडेंट श्रेया ने इंगलिश में लिखे लेख में दीवाली सेलीब्रेशन के बारे मे बताया। श्रेया ने बच्चों से बताया कि उनको किताबें पढ़ने का शौक है। पापा उनके लिए बुक्स लेकर आते हैं। वह बहुत सारी बुक्स पढ़ना चाहती हैं। बुक्स से हमें बहुत नॉलेज मिलती है। उनको फिक्शन स्टोरी पढ़ना पसंद है।
श्रेया ने कौआ, हंस, तोता और मोर की कहानी सुनाई, जिसका संदेश है कि हम जैसे भी दिखते हैं, जैसे भी रहते हैं, उसमें संतुष्ट रहना चाहिए। हमें अपनी बेहतरी के लिए कार्य करना चाहिए, न कि किसी दूसरे से बराबरी और ईर्ष्या के लिए। क्लास टू की तनिष्का ने एक सवाल पर कहा कि हमें नदियों में कूड़ा नहीं फेंकना चाहिए। लक्ष्य ने कहा, नदी हमें हमेशा आगे बढ़ते रहना, सिखाती है।
बच्चों ने हवा को एक दिन की छुट्टी दे दी जाए तो क्या होगा, अगर आप नदी होते तो इंसानों से क्या कहते... जैसे सवालों से जवाब दिए। बच्चों को हमने पंचतंत्र की कहानी कछुआ और दो हंस सुनाई, जिसके माध्यम से संदेश दिया गया कि ज्यादा बोलना अच्छी बात नहीं है। कहां, कब और क्या बोलना है, इस बात का भी ध्यान रखा जाए।
हमने उनको लगभग 40 साल पहले सरकारी स्कूल में पढ़ी कविता-
हाथी पहने पेंट और हथिनी पहने मैक्सी।
निकल पड़े वो खुली सड़क पर, ढूंढने लगे वो टैक्सी।
तभी मिली उनको एक टैक्सी, जिसमें ड्राइवर बंदर।
झटपट खोल द्वार, हाथी लगा सरकने अंदर।
बंदर बोला, सुनो महाशय, और कहीं तुम जाओ।
ये मेरी छोटी सी गाड़ी, ट्रक कहीं रुकवाओ।
कार्यक्रम में आरव्या, प्राज्या शर्मा, तनिष्का, अनुष्का, गर्व, आरवी, अवनी, आकांक्षा, अर्नव, लक्ष्य, रुद्रांश, पार्थ, यश, काव्या, शौर्या, श्रेया, त्रिशिका, कुनाल, अभिभावक प्रियंका, पारूल आदि शामिल हुए। अगले पड़ाव पर फिर मिलते हैं, तब तक के लिए आप सभी को बहुत सारी खुशियों और शुभकामनाओं का तकधिनाधिन।



Thursday, October 10, 2019

केदारघाटी के गांवों में बच्चों से मुलाकात

तकधिनाधिन की टीम कहीं जाए और बच्चों से मुलाकात न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। हम तो हमेशा तैयार हैं बच्चों से बातें करने के लिए। उनकी कहानियां और कविताएं सुनने के लिए। इस बीच अवसर मिलता है तो अपनी भी कुछ कहानियां सुना देते हैं। पर हमारी कोशिश रहती है कि साझा संवाद हो। पहले बच्चों को सुना जाए, उनको जानने की पहल की जाए। बच्चे भी बहुत कुछ सोचते हैं और उनके पास भी बहुत सारे सवाल हैं और जवाब भी। जिज्ञासा होगी तो सवाल पूछेंगे और सवालों के जवाब मिले तो जानकारी बढ़ेगी, इसलिए बच्चों में अपने सवाल बेहिचक पूछने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलना ही चाहिए।
खैर, इस बार मानवभारती प्रस्तुति तक धिनाधिन के पड़ाव थे केदारघाटी के गांव। मंगलवार 24 सितंबर 2019 की सुबह हम बणसू गांव में थे। बणसू गांव ऊखीमठ ब्लाक का बेहद शानदार गांव है, जहां बेशुमार हरियाली है। ऊखीमठ से गुप्तकाशी और वहां से करीब नौ किलोमीटर दूर स्थित है बणसू गांव। बणसू में जवाहर नवोदय विद्यालय के पास प्राथमिक विद्यालय और आंगनबाड़ी केंद्र हैं। प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश करते ही सबसे पहले आंगनबाड़ी केंद्र का भवन दिखा, जिसमें हमारी मुलाकात सरोजिनी देवी जी से हुई। सरोजिनी जी यहां आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं और बणसू गांव में ही रहती हैं। 
सरोजिनी जी से हम बहुत प्रेरित हुए। प्रेरणा की वजह क्या है इस पर कुछ ही दिन में बात करेंगे। फिलहाल उनके सम्मान में यह रचना जरूर प्रस्तुत करना चाहूंगा – 
हिमालय पर जिंदगी हम, हिमालय सा हौसला हम।
हिमालय की शान हैं हम, हिमालय की जान हम।।
आंगनबाड़ी केंद्र भवन के सामने है बणसू का प्राइमरी स्कूल और इन दोनों भवनों के बीच में है एक मैदान। दोनों भवन और उनका संयुक्त मैदान बाउंड्रीवाल से सुरक्षित है। यह मैदान ज्यादा बड़ा तो नहीं है पर छोटे बच्चों के खेलने कूदने के लिए काफी है। जब हम यहां पहुंचे तो मिड डे मील के बाद बच्चे घास के इस मैदान में खेल रहे थे। कुछ छोटे बच्चों को तो हमने मैदान में लोट लगाते हुए देखा, जो बहुत खुश नजर आ रहे थे। एक-दो बच्चे अभी भोजन कर रहे थे।
कुछ बच्चे एक दूसरे को पकड़ने के लिए दौड़ लगा रहे थे। यहां हमने बच्चों को उत्साह और बेफिक्र खेलते कूदते देखा। मैं तो केवल यही समझा कि खाना पचाने के लिए दौड़ना जरूरी है और दौड़ते हुए कहीं गिर भी जाओ तो मैदान में बिछी घास आपको चोट नहीं लगने देगी। मेरा बचपन भी कुछ ऐसा ही बीता, पर वर्तमान में देहरादून शहर में अधिकतर बच्चों को खेलने के लिए मैदान ही नहीं मिल पा रहे हैं। उनके खेलने के मैदान स्क्रीन साइज हो गए। कंप्यूटर या फिर मोबाइल ही उनके खेलने के मैदान हैं, जहां स्वस्थ रहने की संभावना नहीं है।
हमें देखकर कुछ बच्चों ने सर जी गुड मार्निंग कहा। हमने भी गुड मार्निंग में जवाब दिया और फिर शुरू हुआ परिचय का सिलसिला। बच्चे ही हमें अपनी शिक्षिका के पास ले गए। प्राइमरी विद्यालय की शिक्षिका शांति बर्थवाल जी को हमने अपना परिचय दिया और तकधिनाधिन के बारे में बताया। शिक्षिका शांति बर्थवाल जी ने बताया कि इस स्कूल में बच्चों को कहानियां और कविताएं सुनाई जाती हैं। 
हमें यह जानकर बहुत खुशी हुई, क्योंकि कहानियां अनुभवों और संदेशों को पीढ़ी दर पीढ़ी पहुंचाने का शानदार माध्यम हैं। इनको बच्चे बड़े ध्यान से सुनते हैं और कहानियां हमेशा याद रहती हैं। हमारे साथ मैनेजमेंट स्टडी के जानकार जतिन कक्कड़ भी तकधिनाधिन में शामिल हुए। जतिन वर्तमान में रुड़की आईआईटी के मैनेजमेंट स्टडी विभाग में कार्य कर रहे हैं। सोशल वर्कर हिकमत सिंह रावत व मृगेंद्र सिंह भी इस कार्यक्रम का हिस्सा बने।
शिक्षिका रचना रावत जी ने बच्चों को कहानियां सुनने के लिए घास के मैदान पर गोल घेरा बनाकर बैठने के लिए कहा। एक बात जो हमें बहुत अच्छी लगी कि शिक्षिका के एक निर्देश पर बच्चे कुछ ही देर में बेहद अनुशासित तरीके से मैदान पर गोल घेरा बनाकर बैठ गए, वो भी उस समय जब वो पूरे मैदान में दौड़ लगाते हुए और घास पर लौट लगाते हुए खेल रहे थे।
अक्सर देखने में आता है कि कक्षा एक से आठ तक के बच्चों को पंक्तिबद्ध बैठाने में काफी समय लगता है। यहां तो पांचवी तक के छोटे बच्चे थे। उनके साथ आंगनबाड़ी के बच्चे भी थे। आंगनबाड़ी का एक बच्चा तो बेल बजते ही अपना खाना छोड़कर क्लास की ओर जाने के लिए खड़ा हो गया। सहायिका ने उसको बैठाकर खाना खिलाया। इसका मतलब यह हुआ कि छोटे बच्चे बेल बजने और समय का महत्व जानने लगे हैं, इसका श्रेय शिक्षिकाओं और बच्चों की देखरेख करने वाली सहायिकाओं को जरूर जाना चाहिए। आपको तो पता ही है कि तकधिनाधिन की टीम कहीं भी जाए, उसके साथ पेड़ वाला सवाल जरूर घूमने जाता है। हमने गोल घेरे में बैठे बच्चों से पूछ लिया, पेड़ घूमने क्यों नहीं जाता। हम यह जानकर हैरत में पड़ गए कि यहां तो सभी बच्चों के पास कुछ न कुछ जवाब था। छोटे बच्चे भी जवाब बताने के लिए हाथ उठा रहे थे। यहां शिक्षिकाओं ने बच्चों को सिखाया है कि कुछ पूछने या बताने से पहले अनुशासित तरीके से हाथ उठाकर परमिशन लेनी चाहिए। प्रिंस ने कहा- सर जी, अगर पेड़ घूमने चला गया तो हम उसको पानी नहीं दे पाएंगे। स्पष्ट है कि प्रिंस और उसकी साथी पेड़ पौधों के महत्व को जानते हैं और उनको पानी देते हैं।
इसी तरह अतुल ने कहा, पेड़ के पैर नहीं होते। बच्चों के जवाब कुछ इस तरह थे, पेड़ की जड़ें जमीन में होती है, इसलिए घूमने नहीं जाता। वो घूमने चला गया तो खेतों को खराब कर देगा। वो सड़कों को तोड़ देगा। वो इधर-उधर घूमेगा। मौका देखा और हमने सवाल को ही घूमा दिया, पेड़ अगर घूमने जाता तो क्या होता। जवाब मिला, वो हमें दिखाई नहीं देता। वो दौड़ता रहता। वो गाड़ियों को तोड़ देता। एक बच्चे ने हमारे सवाल पर ही सवाल उठा दिया कि पेड़ घूमने नहीं जाता, वो तो एक ही जगह खड़ा रहता है।
अब हमने पूछा, पेड़ हमें क्या देता है। अलग- अलग बच्चों के जवाब कुछ इस तरह हैं- फल, छाया, हवा, आक्सीजन, पानी, खाना, पत्ती, चारा, लकड़ी, फल….। अगर यह घूमने चला जाएगा तो क्या होगा, बच्चे बोल उठे, हमें छाया कौन देगा, फल कौन देगा, आक्सीजन कौन देगा, पत्ती कौन देगा, लकड़ी कौन देगा। बच्चे अब पेड़ के महत्व को बहुत अच्छे से जान चुके थे और एक साथ बोले, पेड़ों की रक्षा करो, पेड़ों को काटो नहीं। इसी तरह हमने सवाल पूछा, अगर हवा छुट्टी पर चली जाए तो एक बिटिया बोली, हवा को छुट्टी नहीं दे सकते।
उनकी शिक्षिका ने पूछा, क्यों छुट्टी नहीं दे सकते, आप तो छुट्टी लेते हो, तो हवा क्यों नहीं। एक और बच्चे ने कहा, हवा रुक गई तो सांस नहीं ले पाएंगे। सभी ने तालियां बजाकर इस जवाब का स्वागत किया। हमने कहा, हवा तो आपके लिए बहुत कुछ करती है पर आप तो हवा को परेशान करते हो। बच्चों ने कहा, हम परेशान नहीं करते हवा को। यहां तो बहुत हवा चलती है।
छोटे बच्चों ने हमें मछली जल की रानी है…, आलू कचालू बेटा कहां गए थे…., छह साल की छोकरी,. भरकर लाई टोकरी… कविताएं, अभिनय करके सुनाईं। यहां सभी बच्चे अपनी अपनी कविताएं सुनाने को तैयार थे। हमने बच्चों को साहसी नन्हा पौधा कहानी सुनाई। बच्चों ने तालियां बजाईं और एक बच्चे ने हमें बताया कि प्रकृति कौन हैं। उसने कहा, पेड़, पौधे, मिट्टी, जल, पहाड़ जिसने बनाए, वह प्रकृति है। हमारी इच्छा थी कि बच्चों के साथ और ज्यादा समय बिताए, पर समय कम था। हमें बणसू गांव के निवासियों से बातें करनी थी। बच्चों से फिर मिलने का वादा करते हुए तक धिनाधिन की टीम ने विदा ली।

Sunday, July 28, 2019

डॉगी की चिट्ठी

सभी इंसान बुरे नहीं होते

जमाना कितना भी क्यों नहीं बदल जाएसभी इंसान बुरे नहीं होते। कुछ इंसान हैं जो हमारे साथ पशुता वाला नहीं बल्कि विशुद्ध रूप से मानवता वाला व्यवहार करते हैं। हम बोल नहीं पातेउनको बता नहीं पातेहमारे पास इंसानों से संवाद की ताकत नहीं है। हम अपनी तकलीफों और बातों को कुछ संकेतों के जरिये उन तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं। 

कभी वो समझ पाते हैं और कभी नहीं । भला हो उनका जो हमारी पीड़ा को समझकर राहत पहुंचाते हैं। हम शुक्रगुजार हैं उन लोगों के जो हमारे सुख और दुख को लेकर संवेदनशील हैं। दोस्तों मैं तुम्हें यह चिट्ठी उस पशु चिकित्सालय से लिख रहा हूंजहां मैं उस वक्त लाया गया थाजब मुझमें जीने की आस लगभग खत्म हो गई थी। 

उस रात मैं देहरादून के मोहकमपुर फाटक के पास खड़ा था। फाटक बंद था। अब तो वहां फ्लाईओवर बन गया है। मेरे पैरों में बहुत दर्द हो रहा था और मैं अचानक रेलवे ट्रैक से कुछ ही दूरी पर बीच  सड़क पर गिर गया। ट्रेन जाने के बाद फाटक खुला और गाड़ियों ने रफ्तार पकड़ ली। कोई  मुझे नहीं देख पाया और थोड़ी ही देर में मेरे ऊपर से एक के बाद एक करके कई गाड़ियों के टायर गुजर गए। 

मैं बुरी तरह जख्मी हो गया। मेरे मुंह से खून का फौव्वारा फूट पड़ा था। मैं सांसें गिनने लगा। बहुत दर्द हो रहा था। शरीर से जान बाहर निकलने की तैयारी कर रही थीऐसे में, मैं तेजी से कराह भी नहीं पा रहा था। रोनेचीखनेचिल्लाने के लिए भी तो ताकत चाहिएजो मेरे शरीर से कब की जा चुकी थी। मैं उस समय समझ गया था कि वक्त तुम लोगों से दूर जाने का आ गया है। 

वो तो भला हो उन कुछ इंसानों काजिन्होंने खून से लथपथ मेरे लगभग निर्जीव हो चुके शरीर को एक कपड़े पर रख दिया और फिर उस कपड़े के सहारे उठाकर मुझे  सड़क किनारे रख दिया थाताकि मैं किसी सुरक्षित स्थान पर दम तोड़ सकूं और फिर किसी टायर के नीचे आने से बच जाऊं। मैंने पूरी रात सड़क किनारे तड़पते हुए गुजारी। फिर नई सुबह के साथ यह उम्मीद जगी कि अब तो कोई मुझे सहारा देने आएगा।

दोस्तोंआप लोग मुझे तड़पता देखने के बाद भी लाचार थे। उस समय तो मौत से यही शिकवा था कि मुंह में लेने के बाद भी वो मुझे निगल क्यों नहीं रही थी। मैं तो यही प्रार्थना कर रहा था कि प्राण शरीर से बाहर निकल जाएं। लाचारी और दर्द से मुक्ति मिल जाए। मैं भूखा और प्यासा पड़ा थाऊपर से शरीर खून से सना था। पूरा दिन बीत गया पर न तो मुझे मौत आई और न ही मेरी मदद के लिए राह चलता कोई राहत लेकर पहुंचा। 

मैं एक ऐसी उम्मीद के सहारे सड़क किनारे पड़ा कराह रहा थाजिसके पूरा होने को लेकर मुझे शक था। गाड़ियों की लाइटें जलती देखने से मालूम हो गया था कि दिन डूब गया। समझ गया कि अब तो रात होने वाली है। मौत अक्सर रात को ही आती हैइसलिए अब किसी मदद की नहीं बल्कि मौत का इंतजार करने लगा।

थोड़ी ही देर में एक वैन मेरे पास आकर रुकती है और देखता हूं कि दो लोग मेरी ओर बढ़ रहे हैं। समझते देर नहीं लगी कि अब राहत मिलने वाली है। मैंने इंसानों को ही सुना था कि जब जिंदगी बची हो तो मौत खूब सताने के बाद भी कुछ नहीं बिगाड़ पाती। लगा कि अब कुछ भला हो जाएगा।

कुछ ही देर में एंबुलेंस मुझे लेकर चिकित्सालय पहुंच गई। यहां कई दिन के इलाज और वक्त पर खाना-पानी,दवा मिलने की वजह से मेरी हालत में सुधार आ रहा है। मेरा कष्ट दूर हो रहा है और शरीर से बहे खून की रिकवरी हो रही है। 

यहां मेरी तरह लाए गए डॉगियों की पूरी गैंग हैजिनको कभी बांधकर नहीं रखा जाता। ये अपनी इच्छा से कहीं भी बैठ और घूम सकते हैं। यहां डॉगी और कैट सभी एक साथ रहते हैं और दिनभर खेलते हैं। और भी कई तरह के जरूरतमंद और घायल जानवरों को यहां लाया गया है। ये पूरी देखभाल के साथ इलाज पा रहे हैं। समय पर खाना मिलता है और पूरी मौज मस्ती के साथ रहते हैं। 

अगर मैं अस्पताल नहीं लाया जाता तो शायद इस चिट्ठी में अपनी व्यथा को बयां नहीं कर रहा होता। मुझे ठीक होने में अभी कुछ और समय लगेगा। कुछ दिन पहले मैं सुन रहा था कि रेस्क्यू और पूरे इलाज के बाद हमारे जैसे स्ट्रीट एनीमल्स को उसी जगह छोड़ दिया जाता हैजहां से उनको लाया जाता है। ये चाहते हैं कि स्ट्रीट एनीमल्स फिर से खुली हवा में अपनी पसंद की जिंदगी को जी सकें। 

दोस्तों तुम से बिछुड़े हुए लगभग दो महीने हो गए हैंइसलिए तुम सभी को याद कर रहा हूं। तुम लोगों को यह बताना चाहता हूं कि अधिकतर इंसान बुरे नहीं होते। मुझे अपनी गाड़ियों के नीचे कुचलने के बाद कराहता छोड़कर भागने वाले बुरे हो सकते हैं। मुझको सड़क किनारे सुरक्षित रखने वालेमेरे कष्ट को देखकर रेस्क्यू टीम को सूचना देने वाले और आखिर में चिकित्सालय वाले सभी लोग अच्छे इंसान हैं। 

पशुओं के साथ अच्छा व्यवहार करने वाले संवेदनशील लोगों की वजह से ही हम हैं। मैं कुछ वक्त के बाद फिर से डॉगी गैंग में शामिल होकर मोहमकमपुर की गलियों और सड़कों पर दौड़ लगाऊंगा। फिर से खूब मस्ती करेंगे। 

अस्पताल से तुम्हारा दोस्त 

Monday, April 15, 2019

डोईवाला में रोटी बैंक

मैंने अपने मित्र से सुना है कि केशवपुरी में एक बालिका रहती है, जो कोई शब्द बताते ही तुरंत कविता बना सकती है। वाकई बहुत मेधावी है यह बच्ची, लेकिन मैं उससे मुलाकात नहीं कर पाया। केशवपुरी वह इलाका है, जहां अधिकतर परिवारों के सामने हर सुबह रोजगार की तलाश, एक बड़ा सवाल होता है। यहां शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता के लिए जागरूकता की दरकार हमेशा महसूस की जाती रही है।
केशवपुरी औऱ राजीवनगर में रहने वाले कुछ बच्चे डोईवाला की सड़कों पर ही पूरा दिन बिताते हैं। यहां के कई बच्चों को स्कूल का रास्ता दिखाने की जरूरत है। हालांकि यहां सरकारी स्कूल है, लेकिन इन बच्चों को वहां तक ले जाने की चुनौती भी हम सभी को स्वीकार करनी होगी। और भी बहुत कुछ सुना है मैंने केशवपुरी के बारे में..., जिसका जिक्र मैं इसलिए भी नहीं करूंगा, क्योंकि समस्या बताने, सुनाने से ज्यादा विश्वास समाधान पर करना चाहिए।
अभी तक केशवपुरी की यह तस्वीर सबके सामने पेश की जाती रही है। अब आपके सामने केशवपुरी की दूसरी तस्वीर पेश करता हूं, जो वाकई कमाल की है। अब मैं यहां से प्रज्ज्वलित हुई एक ऐसी मशाल का जिक्र कर रहा हूं, जिसकी रोशनी में भूख के खिलाफ एक जंग चल रही है। यह वो बड़ी जंग है, जिसकी शुरुआत एक युवा ने की है, जो दिन हो या रात, सुबह हो या शाम, केवल उनके लिए जीने की कोशिश करता है, जिनसे उसका एक ही रिश्ता है, वो है मानवता का।
कविता वाली बिटिया के घर का पता पूछने के दौरान मेरे मित्र और शिक्षक अजेश धीमान ने मुझे बताया कि केशवपुरी में रोटी कपड़ा बैंक भी है, जिसे मनीष उपाध्याय चलाते हैं। मनीष जी का फोन नंबर मिल गया और रविवार शाम करीब सात बजे तक धिनाधिन की टीम मैं और बेटा सार्थक केशवपुरी में मनीष जी के घर पहुंच गए। केशवपुरी स्थित सरकारी स्कूल के पास है रोटी कपड़ा बैंक, जहां से शुरू हो रही है मानवता के लिए एक बड़ी मुहिम, वो भी बिना किसी शोर के।
रविवार को एक भंडारे से बहुत सारी पकौड़ियां रोटी बैंक में जमा कराई गई थीं। अन्य दिनों में मनीष शाम पांच बजे से पहले ही घर पहुंच जाते हैं। आज मनीष को भी घर लौटने में थोड़ा देर हो गई थी। इसलिए तय किया गया कि पकौड़ियां और खिचड़ी बांटी जाए। मनीष और उनकी पत्नी संतोष करीब 25 से 30 लोगों के लिए खिचड़ी बनाने में जुट गए। संतोष केशवपुरी में ही आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं और रोटी कपड़ा बैंक में मनीष को सहयोग करती हैं। मां अमरेश देवी कहती हैं कि रोटी बैंक पर उनको काफी गर्व है।
करीब आठ माह से रोटी कपड़ा बैंक चल रहा है। मनीष बताते हैं कि वह हाट पर सब्जियां बिक्री करते थे, लेकिन वहां काफी समय लग जाता था, इस वजह से खाना बांटने में देरी होती थी। अगर किसी को समय पर खाना नहीं मिलेगा तो भूखा ही सो जाएगा। कोई भूखा सो जाए, यह स्थिति बड़ी पीड़ा देने वाली है। इसलिए उन्होंने हाट पर जाना छोड़ दिया।
अब वह मंडी से आलू, प्याज लाकर सीधे दुकानों को सप्लाई करते हैं। शाम पांच बजे तक घर लौटकर सब्जी, रोटी बनाने में जुट जाते हैं। अभी तक एक या दो दिन ही ऐसा हुआ होगा, जब हम भोजन देने नहीं जा सके। बहुत बुरा लगा था उस दिन। कोई हमारा इंतजार करे और हम नहीं पहुंचे, यह तो सही बात नहीं है। इसलिए हम हर शाम खाना लेकर जाएंगे, यह हमारा इरादा है।
हमारे पूछने पर मनीष बताते हैं कि रोजाना करीब साढ़े चार किलो आटा गूंथते हैं। रोटियां बनाने के लिए पड़ोस से कुछ बेटियां आ जाती हैं। कभी कभार वह स्वयं रोटियां बनाते हैं। उनके पिता सत्यप्रकाश जी कैटरिंग का व्यवसाय करते हैं, इसलिए वह भी खाना बनाना अच्छे से जानते हैं।
करीब 30 साल के मनीष की सोच बड़ी है और वह रोटी कपड़ा बैंक तक ही सीमित नहीं रहना चाहते, उनकी योजना भविष्य में वृद्धाश्रम बनाने की है। ऐसा वह उन बुजुर्गों की स्थिति को देखकर सोचते हैं, जो या तो अपने बच्चों के तिरस्कार को सहन कर रहे हैं या उनका कोई सहारा नहीं है। मनीष ने बताया कि शुरुआत में 90 साल के व्यक्ति को भोजन का पैकेट दिया था, उनका कहना था पहले खुद खाओ।
मनीष ने तुरंत पैकेट खोला और उनके सामने रोटी सब्जी खाई। इस पर उस व्यक्ति ने धन्यवाद कहकर उनसे खाना ले लिया। उस दिन से मनीष बांटने के लिए ले जाने से पहले भोजन को स्वयं चखते हैं, यह इसलिए भी, क्योंकि वह जानना चाहते हैं कि खाना कैसा बना है। इसमें कोई कमी तो नहीं है।
दूसरे के विश्वास को बनाकर रखने के साथ ही मनीष उन लोगों की निजता का भी सम्मान करते हैं, जिनको रोजाना शाम भोजन दिया जाता है। वह बताते हैं कि दो परिवार डोईवाला से दूर किसी गांव में रहते हैं, वहां शाम को भोजन पकाकर भेजना मुश्किल है, इसलिए उनको पूरे माह का राशन भेजा जाता है। भोजन वो स्वयं पका लेते हैं। इस पूरे कार्य को वह अपने स्तर से, दोस्तों के सहयोग से, कुछ समाजसेवियों की मदद से पूरा कर रहे हैं। शादी, समारोह में बचने वाले भोजन के लिए उनके पास सूचना आ जाती है, वह अपने टैंपों से यह खाना लेकर आते हैं और पैकेट बनाकर बांट देते हैं।
बताते हैं कि मानसिक रोग की वजह से सड़कों पर घूमने वाले, रेलवे स्टेशन पर बेसहारा पड़े, गरीबी और उम्र की वजह से भोजन का इंतजाम नहीं कर पाने वाले लोगों के लिए रोटी कपड़ा बैंक काम कर रहा है। हम केवल शाम को भोजन परोस रहे हैं। दुकानदार निखिल गुप्ता, छात्र लकी कुमार, सिटी बस ड्राइवर मोनू, नीतू सहित करीब 50 युवा इस कार्य में समय-समय पर सहयोग करते रहे हैं। हमारे पास बांटने के लिए कपड़े भी आते हैं। वह बागवानी का शौक भी रखते हैं और पौधे तैयार करके आसपास के लोगों को बांटते रहे हैं।
उन्होंने बताया कि मैं यह सब इसलिए कर रहा हूं,क्योंकि मुझे अच्छा लगता है। हर व्यक्ति दुनिया में किसी खास मकसद के लिए आता है। ईश्वर ने मुझे यह कार्य सौंपा है, तो मैं ऐसा कर रहा हूं। मैं किसी पर कोई अहसान नहीं कर रहा, बल्कि अपने इंसान होने का फर्ज निभा रहा हूं। मुझे लगता है कि हर व्यक्ति को कुछ न कुछ ऐसा करना चाहिए, जो इंसानियत को आगे बढ़ाए। सभी अच्छा महसूस करें, खुश रहें, मैं तो बस इतना चाहता हूं।
मनीष जी से फिर मिलने का वादा करके मानवभारती प्रस्तुति तक धिनाधिन की टीम वापस लौट आई। हम फिर केशवपुरी जाएंगे उस बिटिया से मिलने के लिए जो कोई भी शब्द बताते ही तुरंत कविता की रचना कर देती है, तब तक के लिए बहुत सारी खुशियों और शुभकामनाओं का तक धिनाधिन।

Friday, March 8, 2019

लुभाते फूल, मुस्कराते फूल और कुछ सिखाते फूल

सुबह घर से स्कूल आते समय मुझे बहुत अच्छा लगता है, क्योंकि यह वह समय होता है जब आप फुर्ती और ताजगी से भरे होते हैं। स्कूल में प्रवेश करते ही मुझे दिखाई देती है फूलोें की बगिया। रंग बिरंगे मुस्कराते फूल, कोई बड़ा और कोई छोटा। कोई आसमां छूने के लिए बेताब तो कोई हरियाली के बीच से बाहर की ओर झांकता हुआ, नजर आता। कोई कहता मैं सबसे सुंदर, कोई कहता मेरी ओर देखो, कितने सारे रंग हैं मेरे पास। देख रहो हो न मुझे, मैं कितना प्यारा लग रहा हूं। कुदरत ने मुझे बड़ा मन लगाकर बनाया है, धरती की शोभा बढ़ाने के लिए। कलियां तो मानो यह कह रही हैं कि देखना एक दिन हमारा भी आएगा और तुम हमें देखकर कहोगे, वाह कितने खूबसूरत लग रहे हैं ये फूल। 

फूलों को देखते ही तन और मन ताजगी से भर आते हैं। मैंने सुना है, जब तन और मन में उत्साह हो तो सबकुछ अच्छा लगता है, पढ़ाई के साथ हर वो एक्टीविटी जो हमें स्कूल में कराई और सिखाई जाती है। हां, खेलकूद भी। मुझे अब महसूस होता है कि फूल केवल किसी परिसर और भवन का आकर्षण ही नहीं बढ़ाते, बल्कि अपने पास रहने वाले लोगों को कुछ नया करने का आइडिया भी देते हैं। 


मैंने माली जी से कहा, आप इन फूलों के साथ बहुत मेहनत करते हो। मैं आपको अक्सर फूलों के पास देखता हूं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि आप इनसे बातें करते हो। समय पर खाद, मिट्टी तैयार करना, बीज, पौधे लगाने से लेकर समय-समय पर पानी देना। खराब पत्तियों को हटा देना, पौधे के पास साफ सफाई रखना, धूप और छांव का ध्यान रखना, कीटों से बचाकर रखना, यह सब काम आप फूलों को खिलाने के लिए करते हो। आप इनका ठीक उसी तरह ख्याल रखते हो, जैसे कोई बच्चों का। क्या आपका महत्व फूलों को खिलाने और उनको आकर्षक बनाने तक ही है या इनमें आप इससे भी ज्यादा कुछ और देखते हैं। 

माली जी से बात करके मुझे अपने इस सवाल का जवाब मिल गया कि किसी भी स्कूल में फूलों की बगिया होना, क्यों जरूरी हैं। फूलों से हम क्या सीखते हैं। माली जी ने कहा, मैं फूलों के साथ माता-पिता और शिक्षक दोनों तरह की भूमिका निभाता हूं। माता पिता अपने बच्चों की परवरिश में कोई कमी नहीं छोड़ते। बच्चों की हर सुविधा का ध्यान रखते हैं। वहीं स्कूल में शिक्षक बच्चों की शिक्षा से लेकर उनकी रचनात्मकता को बढ़ाने, अच्छे बुरे का ज्ञान कराने, अनुशासन में रहने, कुछ नया करने के लिए प्रेरित करने, उनकी कमियों को दूर करने, उनको सफलता की ओर बढ़ाने का प्रयास करते हैं। ठीक इसी तरह पौध रोपने से लेकर अलग-अलग रंगों, फूलों को पूरे आकार में खिलाने और आकर्षक दिखाने का काम माली करता है। फूलों ही नहीं, वो उनके पौधों और पत्तियों को संवारने का काम भी करते हैं। मुरझाने वाले फूल पौधों को खिलाने, संवारने के लिए उनका प्रयास ठीक किसी शिक्षक की तरह होता है, जो अपने छात्र को सही दिशा में लाने के लिए हरसंभव प्रयास करते हैं। 

मेरे स्कूल परिसर में फूलों का बसंत है, जो अपने छात्र-छात्राओं को यह सिखाने और बताने का प्रयास है कि आपका मन और तन फूलों की तरह सुंदर और ताजगी से भरपूर हो, तभी तो कुछ अभिनव कर सकोगे, तभी तो आप सफलता की ओर बढ़ सकोगे, तभी तो आप में आसमां को छूने की बेताबी होगी, तभी तो आपका जीवन खुशियों से महक उठेगा। वो भी बिना तनाव के, क्योंकि फूल तनाव से दूर रखते हैं। अब मेरी समझ में आया कि मेरे स्कूल ने फूलों की बगिया क्यों बनाई है। 

केशवपुरी की गीता बेटियों को बना रही आत्मनिर्भर

पढ़ाई अच्छी बात है और यह आपके भविष्य को अच्छा बनाने में मदद करती है। दो साल पहले मैंने कक्षा आठ के बाद पढ़ना छोड़ दिया, पर मुझे अच्छे भविष...