Gandhi park

गांधी पार्कः कंक्रीट के जंगल में हरियाली का दीदार 
दून में तेजी से फैलते कंक्रीट के बीच अगर कुछ सलामत है तो वो गांधी पार्क है। हराभरा गांधी पार्क सुकून देता है औऱ शहर में कहीं मुलाकात और टाइम पास का जरिया भी। देहरादून के इस सबसे बड़े पब्लिक पार्क को उन लोगों की नजर लग रही है, जो हमेशा मुद्दों की लड़ाई पर जोर देते रहे हैं। गेट से लेकर भीतर तक आंदोलनों और सभाओं की गढ़ बन गई गांधीजी की यह स्मृति सुकून तो दे रही है पर बीच-बीच में खलल के साथ। 
 
   राजपुर रोड पर गाड़ियों का शोरशराबा और फिर गांधी पार्क का मेन गेट। शनिवार को यहां शांत माहौल था। हालांकि महीने में 15 दिन यहां कोई न कोई धरना या सभा करते लोग जरूर दिख जाएंगे। अक्सर बंद दिखने वाले इस गेट पर इनका बैनर टांगा जाता है। एक समय पर एक ही व्यक्ति की एंट्री और फिर हरियाली का दीदार कराता पार्क। एंट्री के कुछ और रास्ते भी लोगों ने बना लिए। लंबा चक्कर लगाने से बचने के लिए लोग परेड ग्राउंड और एस्लेहॉल जाने वाली रोड पर लगी रेलिंग से बेरोकटोक कूदकर पार्क में घुस रहे हैं। 
   मार्निंग और इवनिंग वाक के लिए बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक की इस पसंदीदा जगह पर दोपहर में भीड़ नजर आती है। पता चला कि करीब सौ से ज्यादा संख्या में ये लोग अपने संगठन का चुनाव करा रहे हैं। सभा में बदल चुकी इस भीड़ में ठहाके लग रहे हैं और बीच-बीच में तालियों की गड़गड़ाहट पार्क की शांति को भंग करती है। पास ही पॉलीथिन में रखा खाने-पीने का सामान। पार्क में हर कोने में जगह-जगह पॉलीथिन और कोल्ड ड्रिंक की खाली बोतलें इशारा करती हैं कि ये कूड़ेदान में  नहीं फेंकी जातीं।  कई कूड़ेदान टूटे पड़े हैं और ब़ड़ी हो चुकी घास काटने की 
 
     पार्क का एक हिस्सा भागदौड़ में दून को अपने खुशनुमा होने का अहसास करता है। कुछ बच्चे दौड़ लगा रहे हैं और कुछ झूलों का आनंद। पैरेंट्स भी हैं,जो बच्चों के इंज्वाय से खुद को अलग नहीं करते। इन्हीं के बीच फेरी लगाने वाले भी बच्चों के पसंदीदा कॉटन कैंडी बेचने का मौका नहीं छोड़ रहे। पार्क से आगे बड़ा हिस्से उजाड़ भी है। 
    शहीद स्मारक के पास कुछ युवा सेल्फी ले रहे हैं । गुनगुनी धूप और पेड़ों की छांव में बैठे लोग या तो अखबार पढ़ रहे हैं या बतिया रहे हैं। कुछ लोग लैपटॉप पर बिजी हैं और कुछ जगह खाने पीने में मशगूल। सोते और सुस्ताते लोग भी गांधी पार्क में यहां-तहां दिख जाते हैं। सिगरेट के कश लगाने औऱ ताश के पत्ते फेंटने का दौर भी हरियाली के बीच दिखता है। एस्लेहॉल वाले हिस्से की तरफ धूप में अखबार पढ़ रहे प्रेम तीन माह पहले ही सहारनपुर से देहरादून आए हैं। कहते हैं यहां सब ठीक है। देहरादून के ही एक शख्स अपना नाम नहीं बताते पर पार्क को लेकर चिंता जरूर जाहिर करते हैं। कहते हैं दिन में तो सब ठीकठाक ही है, पर शाम को यहां का नजारा बदल जाता है।

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